History

भारतीय क्षात्त्र परम्परा - Part 25

अशोक की अहिंसा नीति का आकलन

इत् सिंग जैसे चीनी यात्री के अभिलेखानुसार अशोक एक सन्यासी तथा बौद्ध भिक्षु था। उनके कथनानुसार उन्होने ऐसी प्रतिमा के दर्शन भी किये हैं। बौद्ध व्यवस्था में कोई भी सन्यासी पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर सकता है। वे किसी भी अन्य आश्रम में प्रवेश कर सकते है।

भारतीय क्षात्त्र परम्परा - Part 23

दुर्भाग्य से अशोक को कृष्ण के समान कोई मार्गदर्शक नहीं मिला और नहीं उसने बुद्ध के समान सत्य को पूर्ण समर्पित जीवन जीया। वह क्षात्र के पथ से भटक गया। मेरी दृष्टि में यह अशोक की एक गंभीर कमी है। एक विशाल साम्राज्य को स्थापित करने के उपरांत एक सम्राट को सतत रुप से धर्मदण्ड के माध्यम से असहायों की सुरक्षा तथा दुष्टों को दण्ड़ देना होता है। उस साम्राज्य का क्या भविष्य हो सकता है जिसका सम्राट घोषणा करता है ‘मै अब कोई युद्ध नही लडुंगा’ ?

भारतीय क्षात्त्र परम्परा - Part 22

चाणक्य यंहा दो शब्दों का प्रयोग करता है – ‘अपवाहयंति’ और ‘कर्षयंति’ अर्थात् ‘पूरीतरह से भक्षण करना’ और ‘उत्पीडित’ करना।

चाणक्य का कहना है कि यदि हम इन कठोर विपत्तियों से बचना चाहते है तो हमे अपने स्थानीय राजा की आवश्यकता है। सिकंदर के आक्रमण से जिस प्रकार उत्तर पश्चिम के राज्यों का विनाश हुआ था उसके उपरांत देश को जिस आशा और विश्वास की आवश्यकता थी वह चाणक्य के दूरदर्शी दृष्टिकोण द्वारा प्राप्त हुआ। चाणक्य ने न केवल एक शक्ति संपन्न साम्राज्य की स्थापना की वरन उसने भारत में सिंकदर के प्रतिनिधि सेल्युकस निकटार को भी हराया।

भारतीय क्षात्त्र परम्परा - Part 19

सनातन धर्म अगणित समस्याओं के श्रेष्ठ निदानों का अनमोल खजाना है। उदाहरण के लिए ‘संकल्प’ पर विचार करें जिसे हम अपने दैनिक पूजा पद्धति की एक क्रिया के रुप में करते हैं। इसमें हम वर्तमान दिन के साथसाथ ब्रह्माण्डिय काल को स्वीकारते है, अपने निवास स्थल के साथ साथ हम ब्रह्माण्डिय देश  को भी स्वीकारते है। हम कहते है “शुभे शोभने मुहूर्ते आद्य-ब्रह्मणः द्वितिया-परार्धे” से लगा कर ‘कर्मकाण्ड़ करने के दिन तक। उसी प्रकार ब्रह्माण्ड से प्रारम्भ कर ‘जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे गोदावर्याः दक्षिणे तीरे’ तक हम दिक् का स्मरण करते हैं। इसमें एक व्यक्ति अपनी स्थिति और विशिष्ट समय

भारतीय क्षात्त्र परम्परा - Part 18

चाणक्य कोई धर्मान्ध व्यक्ति नहीं था। वह स्वयं आसानी से सिंहासन पर बैठ सकता था जैसा कि उन दिनों ब्राह्मणों का राजा बनना प्रचलन में था। मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद पुष्यमित्र शुंग और उसके वंशज शासक बने और उनके उपरांत काण्व लोगों ने राज किया। यह सभी ब्राह्मण थे। चाणक्य ने पद प्रतिष्ठा की कभी परवाह नही की। उसका दूरदृष्टि पूर्ण लक्ष्य ब्राह्म और क्षात्र के समन्वय द्वारा देशवासियों के कल्याण के सुनिश्चित करना था।

भारतीय क्षात्त्र परम्परा - Part 17

जितनी स्वतंत्रता की आवश्यकता है उतनी ही आवश्यकता हमें संयम और आत्मानुशासन की भी है। जब हम नियंत्रणों का सम्मान करना जान लेंगे तब ही हमे अधिकार और सुविधाएँ प्राप्त हो सकती है। निरंकुश स्वतंत्रता, अनियंत्रित इच्छाविलास, मनमौजी सनक लम्बेसमय तक उपयोगी सिद्ध नही हो सकती है। इसका अनुभव हम भारत पर सिकंदर के आक्रमण के प्रसंग में देख चुके हैं। पौरव (ग्रीक वर्णनानुसार पोरस) सिकंदर से हार गया था। ऐसा कहा जाता है कि पौरव एक गणतंत्र का अधिपति था यद्यपि इसमें कुछ अनिश्चितता है। ऐसी कहानियॉ है कि सिकंदर ने उसके साथ मित्रवत व्यवहार किया था। ग्रीक वर्णन पर कितना भरोसा किया जाय य

भारतीय क्षात्त्र परम्परा - Part 16

यत्र तत्र इस बात के भी संदर्भ मिलते हैं कि ग्रीक महिलाओं को भारत में काम पर रखा जाता था। श्यामिलक की पुस्तक ‘पाद-ताडितक-भाण’ में कुसुमपुरा में रहने वाले ग्रीक व्यापारियों का वर्णन है। ’मालविकाग्निमित्र’ में कालिदास ने लिखा है – “सिंधु नदी के दूर छोर पर पुष्यमित्र शुंग के पौत्र वसुमित्र ने ग्रीक सेना के विरुद्ध संघर्ष किया था”, किन्तु इन सब में कहीं भी सिकंदर का सन्दर्भ नहीं है। यह आक्रमण सिकंदर के उत्तराधिकारियों द्वारा उसकी मृत्यु के लगभग 150-200 वर्षों बाद किया गया था। हमारे कवियों तथा नाटककारों ने सिकंदर के आक्रमण को हीं भी एक बडे आक्रमण की मान्यता नहीं दी है