यह स्थिति सनातन धर्म में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य तथा कुमारगुप्त के समय तक भी बनी रही। ऐतिहासिक ग्रंथों तथा अभिलेखों से ज्ञात होता है कि ईसा की पांचवी तथा छठी शाताब्दी तक इस प्रकार का सांस्कृतिक समायोजन तथा समावेश सफलता पूर्वक होता रहा था। अन्य देश, समुदाय तथा संस्कृति के लोग भारत में आये और उन्होने अपनी पसंद के अनुसार वर्ण धारण कर लिया चाहे वह ब्राह्मण, वैश्य अथवा अन्य वर्ण हो। उदाहरण स्वरुप उत्तर भारत के नागर-ब्राह्मण जिनके उपनाम नागर, भटनागर...
उस समय में वेदों का अनुसरण करने वालों ने भी बौद्ध धर्म का बहिष्कार नहीं किया था। सातवाहनों ने न केवल सांची स्तूप के द्वारों का निर्माण करवाया अपितु अमरावती ने एक पूरे स्तूप का निर्माण भी करवाया। उसके कुछ अंश चेन्नई, एगमोर के शासकीय संग्रहालय तथा ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शनार्थ रखे हैं[1]। दिखाई दे रहा है वैसा तो उस समय राजगुरुओं के मध्य भी नहीं था। संभवतः संप्रदाय विशेष की भावना से प्रेरित कुछ मतावलम्बी रचनाकारों की कृतियों ने अन्य पंथो के...
भगवान बुद्ध के जीवन की इस घटना को देखें। एक दिन बुद्ध के विश्वास पात्र तथा संबंधी (गृहस्थजीवनका) विख्यात आनन्द अपने साथ यशोधरा (बुद्ध के पूर्वाश्रम मे की पत्नी) को लेकर बुद्ध के समक्ष उपस्थित होकर कहने लगा “गुरुजी! महिलाओं को भी सन्यास की दीक्षा प्रदान कीजिए!” । जब बुद्ध ने उत्तर दिया ‘नही! यह नही हो सकता है’ तब आनन्द ने पूछा ‘आप महिलाओं को सन्यास की दीक्षा क्यों नहीं दे सकते है ? क्या आप ही नहीं कहते हैं कि सब लोग समान? तब बुद्ध बोले ‘नही !...
ऐसी ही घटना को आज हम गांधी-नेहरु काल में देख रहे हैं – यदि नेहरु जैसा व्यक्ति गांधी का उत्तराधिकारी हो सकता है तो यह गांधी के सिद्धांतों की वास्तविकता को दर्शाता है। जब हम देखते हैं कि किस प्रकार सुभाषचंद्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल और राजगोपालाचारी जैसे सुयोग्य व्यक्तियों पर दबाव डाल कर उन्हे हटा दिया गया तो यह स्पष्ट हो जाता है कि गांधी किसके पक्ष का समर्थन जुटाने में संलिप्त थे। भूतपूर्व जोधपुर विश्व विद्यालय के दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक डा....
Nature
अशोक की अहिंसा नीति का आकलन इत् सिंग जैसे चीनी यात्री के अभिलेखानुसार अशोक एक सन्यासी तथा बौद्ध भिक्षु था। उनके कथनानुसार उन्होने ऐसी प्रतिमा के दर्शन भी किये हैं। बौद्ध व्यवस्था में कोई भी सन्यासी पुनः गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर सकता है। वे किसी भी अन्य आश्रम में प्रवेश कर सकते है। फाहियान, ह्वेन त्सांग, इत् सिंग, धर्मस्वामी तथा अन्य बौद्ध चीनी यात्रियों ने भारत की यात्रा की थी। अनेक अवसरों पर उनके कथन अपनी धार्मिक आस्था से प्रेरित भावना से अथवा...
बुद्ध द्वारा प्रतिपादित सातगुण – सप्तशील लिच्छवियों के प्रश्न के प्रति उत्तर में बुद्ध ने उन्हे सात सिद्धांतों का उपदेश दिया। इस विषय पर महान राष्ट्रप्रेमी और विद्वान सीताराम गोयल ने एक बहुत सुन्दर उपन्यास हिन्दी भाषा में लिखा है जिसका शीर्षक सप्तशील है[1]। बुद्ध ने लिच्छवियों को सन्बोधित करते हुए कहा “जब तक आप सब एकता के साथ खडे रहेंगे तब तक आपकी स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहेगी। आपकी स्वतन्त्रता तब तक बनी रहेगी जब तक आप अपने आन्तरिक मतभेदों को...
दुर्भाग्य से अशोक को कृष्ण के समान कोई मार्गदर्शक नहीं मिला और नहीं उसने बुद्ध के समान सत्य को पूर्ण समर्पित जीवन जीया। वह क्षात्र के पथ से भटक गया। मेरी दृष्टि में यह अशोक की एक गंभीर कमी है। एक विशाल साम्राज्य को स्थापित करने के उपरांत एक सम्राट को सतत रुप से धर्मदण्ड के माध्यम से असहायों की सुरक्षा तथा दुष्टों को दण्ड़ देना होता है। उस साम्राज्य का क्या भविष्य हो सकता है जिसका सम्राट घोषणा करता है ‘मै अब कोई युद्ध नही लडुंगा’ ? महाभारत में...
Himalaya
चाणक्य यंहा दो शब्दों का प्रयोग करता है – ‘अपवाहयंति’ और ‘कर्षयंति’ अर्थात् ‘पूरीतरह से भक्षण करना’ और ‘उत्पीडित’ करना। चाणक्य का कहना है कि यदि हम इन कठोर विपत्तियों से बचना चाहते है तो हमे अपने स्थानीय राजा की आवश्यकता है। सिकंदर के आक्रमण से जिस प्रकार उत्तर पश्चिम के राज्यों का विनाश हुआ था उसके उपरांत देश को जिस आशा और विश्वास की आवश्यकता थी वह चाणक्य के दूरदर्शी दृष्टिकोण द्वारा प्राप्त हुआ। चाणक्य ने न केवल एक शक्ति संपन्न साम्राज्य की...
chanakya
चाणक्य की असाधारण प्रतिभा चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त समान महानता और मनोवृत्ति वाले व्यक्ति थे। इसका साक्षात प्रमाण यह है कि अनेक वर्षों तक एक बृहत्साम्राज्य का उसके द्वारा सुचारु रुप से प्रबंधन किया गया । सात ही, अति महत्त्वाकांक्षी युद्ध प्रेमी सिकंदर के आक्रमण के प्रभाव को पूर्णरुपेण स्मृति पटल से ही मिटा दिया गया। इसी से ज्ञात होता है कि उनकी विकास की कार्य योजना कितनी प्रभावकारी थी। अपनी दृढ़ राष्ट्रीय अस्मिता भाव से प्रेरित उनका राष्ट्रप्रेम...
अर्थशास्त्र में क्षात्र चेतना चाणक्य ने गणतांत्रिक व्यवस्था में जो भी श्रेष्ठ था उसे अपनाते हुए साम्राज्य की अश्वमेध की अवधारणा को भी पुनः लौटाया। इन दोनों का मूल वेदों में है। जरा सोचिए कि हिन्दू वैश्विक दृष्टिकोण में यज्ञ की अवधारणा कितनी विशाल और दूरगामी है ! जो भी इस उदारवादी अवधारणा का विरोध करता है उसे निश्चितरुप से परेशानियों का सामना करना होगा। यह सत्य है कि दार्शनिक दृष्टि से आन्तरिक यज्ञ, बाह्य कर्मकाण्डयुक्त यज्ञ से श्रेष्ठ है किंतु...